Monday, January 19, 2009

तुम ख्वाब हो मेरे

तुम ख्वाब हो मेरे, मेरी आँखों की मैकशी
तुम्हे पाकर यु लगा, कुदरत ने मुझपर इनाएत की है कोई
जो मेरे आँचल से तुम्हे
बाँध दिया
मेरे इश्क का आशियाँ तभी
तो रौशनी से खिल उठा
और हजारो सितारे आकर मुझसे कहने लगे

" कुदरत की इनायत हुइ है तुझपर
कभी शिकायत करना
जाने कितने लोग तरस कर रह जाते है
तुझे उन गुलशनों की खुशबू मिली है ।"

Dikshya


2 comments:

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) said...

दीक्षा जी, बेशक कवितायें तो आपकी अच्छी बन पड़ी हैं.....मगर टाईपिंग की अशुद्दियां अत्यन्त ज्यादा हैं....सो मेरी आपको विनम्र राय है...कि कुछ भी प्रकाशित करने से पूर्व उसे एक बार नज़र से अवश्य फिरा लें....ज्यादा गलतियां अखरती ही नहीं,बल्कि व्यवधान भी पैदा करती हैं.....आशा है,ध्यान रखेंगी...!!

आशीष said...

बहुत खूब दीक्षा जी ... आपने बेहद खूबसूरत भावनाए और उन्हें शब्दों में ढालने का हुनर पाया है....