Sunday, September 15, 2013

दिल मेरो तोडी गयो,बसेर आँखा बाट
सीसा सरि फुटें म ,खसेर आँखा बाट

चुमेर हात उसले एक रात यो भनेथ्यो
घायल बनाइ देउ, डसेर आँखा बाट

छन् बहाना अनौठा,प्रेमी यी झुठा भन्छन
उम्किने बाटो छैन ,फसेर आँखा बाट

भन्छु म नजुधाऊ कोहि पनि आँखा आँखा
मुटु जलाई जान्छन, पसेर आँखा बाट

एकान्त मैले रोजें ,र रोजें साथ आफ्नै
भाग्दै छु आज सम्म,तर्सेर आँखा बाट। …।

2 comments:

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...



☆★☆★☆

चुमेर हात उसले एक रात यो भनेथ्यो
घायल बनाइ देउ, डसेर आँखा बाट

वाऽहऽऽ…!
भाषा नहीं पहचान पाया हूं... लेकिन भाव समझने में परेशानी नहीं हुई...
आदरणीया दीक्षा जी

आपके ब्लॉग की बहुत सारी रचनाएं अभी देखी
अच्छा लिखती हैं आप !
सुंदर रचनाकर्म के लिए साधुवाद
आपकी लेखनी से सदैव सुंदर श्रेष्ठ सार्थक सृजन हो...

हार्दिक बधाई और शुभकामनाओं सहित...
-राजेन्द्र स्वर्णकार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...



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