Friday, March 11, 2011

इन दिनों कुछ यों जिंदगी गुजर रही है
तू है यहीं कहीं,फिर भी नज़र से दूर है
रौशनी चुभ रही हैं आँखों में, अंधेरों में खोने का मन है
छुपा रही हूँ दुनिया की नज़रों से अपनी आँखों की मायूसी को
जाने कैसे साँसे चल रही है मेरी, न  मैं  जानती हूँ न ही तू
तू बेखबर मुझसे,में बेक़रार तेरे लिए ...


इन दिनों कुछ यों जिंदगी गुजर रही है
ये खुसी के दिन हैं या ग़म का साया
अजीब सी कसमकस है ,यही दुआ करती हूँ
सलामत रहे तू जहाँ भी रहे
दुआ करती हूँ ये  इंतजार अब और लम्बी न हो
जुदाई कभी भी अच्छी नहीं लगती
सच मैं ....जुदाई कभी भी अच्छी नहीं लगती


Thursday, September 30, 2010

ये दूरीयां

ये दूरीयां ये सिसकियाँ ,ये घुटती हुई जिंदगी
हथेली के रेखाओं से मिटती हुई जिंदगी...

क्या पाता कब तलक, रहेगी रात बाक़ी
लौ धीमी जलती कभी बुझती हुई जिंदगी.

तलाश तो ता उम्र, रही हमें फूलों की
हर सू मगर काटों से चुभती हुई जिंदगी.

दामन तेरा थामा तुने,झटक के यूं दूर किया
परछाई को तेरी फिर भी ढुंढती हुई जिंदगी..

तूफानों की ख़ता ही क्या,साहिलों ने दग़ा दिया
दुनियां की खुदगर्ज़ी में लुटती हुई जिंदगी.....

Monday, August 30, 2010

जब दिल दुखता है तो.....

बन्द दरवाज़ा  और एक छोटी सी खिड़की
कमरे मे फैली हुई उदासी की बदबू
तुम  अभी अभी जाने से पहले
जो मुझ पर चिल्लाये थे
तुम्हारी वो तेज़ आवाज़
अभी तक इसी कमरे में
घुम रही है,
जैसे की अवाज़ीं की तरंगें घुमती रहती हैं
हवाओं म घुल घुल कर, पूरे वायुमंडल में


खिड़की, हल्की सी खोल लेती हूँ
थोड़ी सी रौशनी कमरे में आती है
जैसे इसे  कितनी जल्दी हो  अन्दर आने की
बाहर देखती हूँ,दूर दूर तक जाते अनजाने रास्ते
और उन रास्तों से गुजरते हुए लोग
एक तमन्ना जाग उठती है
में भी चलूँ इन अनजाने राहों मे
दूर बहुत दूर तलक
मुझे खबर भी न हो
कहाँ तक जाना है,बस इतना ही
बस इतना मालूम हो
लौट कर वापस नहीं आना है
फिर इन्ही बेतुके से ख़यालों मे
दिल आजाद पंछी की तरह नाचने लगा
और मैंने जल्दी से खिड़की बन्द करदी
कहीं मुझे आदत न पड़ जाये सपने देखने की
क्यों की हक़ीकत तो अभी भी यही है
बन्द दरवाज़ा और ये छोटी सी खिड़की.....


बहुत बार सोचा मैंने
में उठाउंगी पहला कदम
में अब सारी दूरियां मिटा दूंगी
और जिंदगी फिर से मुस्कुराने लगेगी
उफ़.......
क्या होता....कुछ भी नहीं.....
मैंने बहुत बार अपनी  मेहँदी की खुशबू से..
इस उदासी की बदबू को मिटाना चहा
वो नहीं माना,वो फिर कभी मेरा हुवा ही नहीं
वो उसी बदबू में जीने लगा, और
और में जीने से ज्यादा घुटने लगी


अब सोचती हूँ,काश के कभी
कभी वक़्त लौट आता
तो तब के बिगड़े इस जिंदगी के हिसाब को
कैसे भी करके सही करती
और 'round figure' में उसे तब्दील करती
फिर न उसका न मेरा, हिसाब बराबर
पर... ये सिर्फ मेरा
दिमागी फितूर के अलाबा कुछ भी नहीं....
मैं इन दिनों ,बस ख़यालों में ही ऐसा किया करती हूँ
मेरा मतलब,'round figure'और हिसाब बराबर
फिर कहती हूँ ''लो,अब हिसाब बराबर हुवा
न तुम्हारा कुछ बाकी रहा न मेरा
चलो अब तो छोडो
मेरी वजूद से क्यों चिपके हुए हो''


मैं केवल ''नीलिमा'' हूँ ''नीलिमा''
मैं आज बहुत खुश हूँ
''देखो मैंने आज अपने नाम के पीछे
तुम्हारा नाम नहीं लगाया''
''नीलिमा''नीलिमा''''नीलिमा''
वाह, कितना प्यारा है मेरा नाम
और मुझे
बहुत महोब्बत है अपने इस नाम से.........

Thursday, August 12, 2010

[जो न मिल सके वही बेवफ़ा
ये बड़ी अजीब सी बात है
जो चला गया मुझे छोड़ कर
वही आज तक मेरे साथ है ]
{नूर जाहाँ की  गीत  ने  फिर से एक बार मेरे दिल को  शिकायत करने पर मजबूर कर दिया और कुछ लब्ज़ निकल कर पन्नो पर बिखर गए  आप सब को सुनाना चाहती हूँ}

कितनी बेशक्ल सी बन गयी है जिंदगी
रेत पर लिखा  हुवा कोई नाम जैसा
जिसे हर एक पल बाद
हवा का एक झोंका अपने साथ उड़ा ले जाता है

अब तो मेहँदी का ये  गहरा  रंग भी झूट लगने लगा है
सोचती हूँ किस नामुराद ने कहा होगा
के मेहँदी का  गहरा  रंग तो सबूत होता है
तुम्हारे लिए किसी के चाहत का
अब कोई क्या जाने
मेरे लिए इस से बड़ा मजाक और क्या होगा
देखो तो सही , मेरे  हाथों में मेहँदी
कितनी गहरी  रची है........

तुम अपने जिद मै मुझे कुचलते चले गए
सोचा चलो तुम्हारे कुछ काम तो आई
अब जब मेरा अक्श ही मुझसे बेगाना हो चूका
तो तुम मुझसे पूछते हो की ,"" तुम्हारा नाम क्या है?'

Thursday, July 15, 2010

नीलिमा तुम से प्यार करता हूँ.....

मेरे खिड़की के नीचे एक चिट्ठी कोई फ़ेक गया था
में जल्दी से नीचे भागी थी,चिट्ठी पढने के लिए
पत्थर में लिपटा हुवा कागज़ का टुकड़ा ....
उस पर लिखा था ''निलीमा तुम से प्यार करता हूँ''

पता नहीं आज अचानक कैसे याद आया मुझे
मेरे खिड़की के नीचे एक कागज़ का टुकड़ा
भरी बारिश में अकेले भीग रहा था
सायद इसीलिए .....

जिंदगी फिर भी चल ही तो रही है
मैंने जबाब दिया होता  तो भी  चलती ही
और  अभी भी चल रही है
हाँ ..हो सकता है जिंदगी कुछ आसान होती
और यूं भी हो सकता है
फिर वही जिंदगी मुश्किल लगती
इंसानी फ़ितरत जो है हमेशा नाखुश

''नीलीमा तुम से प्यार करता हूँ''
मैंने इन शब्दों बहुत बार पढ़ा
कभी छुपती कभी छुपाती
में तो बाबरी सी हो गयी थी
इस से पहले कभी भी
अपना नाम इतना अच्छा नहीं लगा
  
पर नीलिमा कभी कह नहीं पाई
उस से जिसने उसके खिड़की के नीचे
एक छोटा सा कागज़ का टुकड़ा फेका था
काश कह पाती''में भी तुम से प्यार करती हूँ''
लेकिन....
और आज तक वो जबाब
दिल के किसी कोने में दबा हुवा है
सायद कभी ज़ुबां पर आये
और कहे की
''तुम से महोब्बत है ''

Sunday, June 27, 2010

तुम गैर हो.....

तुम गैर हो ये कह नहीं सकती
तुम दिल में हो ऐसा भी नहीं है
चलते ही चलते ये फासले बढ़ गए कैसे
तुम से दूर जी  लूँगी  ये कह नहीं सकती

तुम्हारे दिल में कोई कोना मेरे लिए बचा होगा
मेरा दिल तो जाने कब से टुटा पड़ा है
फिर टूटे दिल में कोई कोना कहाँ से लाउ
जिस में तुम्हारा अक्श छुपा हुवा हो...........

Sunday, June 13, 2010

वक़्त ने जो दिया है दर्द....

वक़्त ने जो दिया है दर्द
तुम उसे क्या मिटाओगे
तुम भी तो ज़माने की तरह
वक़्त के ही मुलाज़िम हो

हम अपने दुनिया में
तनहा ही अच्छे भले हैं
तुम पास न आना कभी
वरना अपने साथ तुम
वही वक़्त ले आओगे
फिर दर्द का एक नया
सिलसिला शुरू हो जायेगा......

Wednesday, June 9, 2010

जिंदगी की कहानी .....

जिंदगी की कहानी बदलती रही.
लड़खड़ाई कभी फिर संभलती रही..

क्या जाने क्या हुवा इस सफ़र में भला.
हुई सुबह नहीं रात ढलती रही..

क़िस्सा-ए-जिंदगी क्या बताऊ तुम्हे.
वो हुवा न मेरा हाथ मलती रही..

तुम से मिलने की चाहत को दिल में लिए.
मैं बहाने से घर से निकलती रही..

तुम को पाने की धुन में क्या क्या न किया.
तुमने देखा नहीं में संवरती रही..

कोई इल्म न तुम को रहा आज तक.
हसरतें मेरी तनहा ही जलती रही..

Tuesday, June 1, 2010

मेरो विस्मृती को गर्भ मा.....
               
                                    हुन सक्छ तिमीलाई एक युग लाग्ला
                                    मेरो विस्मृतीको गर्भ मा बिलाउन
                                   स्मृतीका पट्यार लगदा दिन हरु मा
                                     म पनि उसै गरी बाँची रहेछु

                          समय अनि जिंदगी को यो मापदंड
                           मेरो अघि पूर्ण रुपमा बद्ली सकेको छ
                        हिजो जे थियो आज ठीक त्यसको विपरीत
                     मुठी खोल्छु खाली खाली खाली केवल रित्तो .......

                             
                      म सक्दिन तिमीलाई सुनाउन
                   म सक्दिन तिमीलाई समझाउन
                       केवल बिलाउन चाहन्छु म पनि
              सायद तिम्रो विस्मृतीको गर्भमा
            सायद तिम्रो विस्मृतीको गर्भमा ..........



     










                                 

Sunday, May 23, 2010

सकम्बरी सुयोगवीर पारिजात र सिरीष को फूल [नेपाली कविता]

तिमी मलाई आफ्नो नजिक आउन नदेऊ
म केही न केही गरिदिन सक्छु
म आगो बनिसकें भित्र भित्रै
हुन सक्छ तिम्रो मुटु जलाउन सक्छु ..


तिमी जस्तै म पनि एक्लै एक्लै दुखेको छू.
नभन संग संगै दुखौं जिन्दगीमा.
आवारा बतास बनेको छू हिजो आज
आफु संगै तिमी लाई उड़ाउन सक्छु..

सकम्बरी सुयोगवीर पारिजात र सिरीष को फूल
इशारा निशाना मौन हाम्रो जिंदगीको
समयको सीमा रेखा नाघ्ने आंट आऊछ जब
एउटा अर्को सिरीष को फूल फुलाउन सक्छु.
एउटा अर्को सिरीषको फूल फुलाउन सक्छु

Thursday, May 20, 2010

चेहरा तुम्हारा कुछ जाना पहचाना सा..

चेहरा तुम्हारा कुछ जाना पहचाना सा॥
सायद मैंने अपने ख्वाबों में देखा है तुमको
कई बार रात में दिन में सुबह को या शाम को
हाँ मैंने बस तुम को ही देखा है
या यूं कहू देखा था,आज बड़े दिनों बाद
पास से देखा मैंने तुम्हारा चेहरा मुझे अजनबी सा लगा
मानों में तुम को जैसे जानती ही नहीं
या यूं कहू तुम को कभी इस से पहले देखा ही नहीं

अब नहीं कह सकती की ...
चेहरा तुम्हारा कुछ जाना पहचाना सा.....
क्या तुमने इस से पहले नक़ाब पहन रखा था?
या अभी पहने हुए हो?
कुछ तो बताओ
फिर क्यों हुवा ऐसा
चेहरा तुम्हारा वो जाना पहचाना सा...
एकदम से अजनबी कैसे हो गया?....

अरे .......दोस्त
हम तो शायर है दिल के मारे हुए॥
दुनियां से हारे हुए ....

'' इश्क भरे अंदाज़ में फ़रेब करना
जान गए के तुम्हारी फितरत है
यूं तो बेवक़ूफ़ हम ही थे
जो समझ बैठे के
फ़रेब का चेहरा कितना हसीं होता है.....''

एक नाचती तितली को जो अपने हाथो से मरोड़ा तुमने
तुम खुश हुए अपने जीत पर
उसके हर अश्क जा जबाब जब वो मांगेगा तुम से
सरेआम जिंदगी का पन्ना पलटते रह जाओगे....''



nepali ghazal

 मेरो माँयालाई बजारमा सजाउने तिमी नै हौ.
 तमासा म बन्दा ताली बजाउने तिमी नै हौ ..

आफ्नै निर्दोष विश्वासको नीलामीमा सड़क मांझ
नाच्न विवश पार्दै चांप बंधाउने तिमी नै हौ..

मेरो चोखो समर्पण र भावनाको चिता माथी.
आफ्नो सपनाको महल बसाउने तिमी नै हौ..

Monday, April 26, 2010

प्यार-ओ ख्वाब को.....


प्यार-ओ-ख्वाब को एक जगह रखना.नाम देना दराज़ फुलों का।
निखर जाते हैं तेरी जुल्फों में और भी,तुम को मालूम हो ये राज़ फुलों का॥

है वजूद फुलों का तो,इश्क जिंदा जाहाँ में है।
वरना देख लो गुलशन में,दीवाना मिजाज़ फुलों का॥

घुला देना खुशबू में खुद को,खील जाना काटों के बिच।
इश्क की तरह यहाँ भी,क़ुरबानी है रिवाज़ फुलों का॥

वहिज़ भी गुलशन से अब.लौटा है आशिक़ बन कर।
लो हो गया साबित,आशिक़ाना अंदाज़ फुलों का॥

क्या बताऊ किस कदर,डूबा हूँ तेरी जुस्तजू में।
तेरी सलामती को उस के दर पर ,भेजा है नमाज़ फुलों का॥

[इस ग़ज़ल में मतला का पहला मिश्रा मुझे श्रद्धा जी का ब्लॉग भीगी ग़ज़ल में मिला था जो अधुरा था उन्होंने लिखा था काफिया दोष के चलते पूरा नहीं बन पाया आप सब से गुजारिश है अपना राय दें ]



Friday, April 23, 2010

फ़ुर्सत की तलाश.....


एक दिन मैंने उस से कहा ''तुम्हारे पास तो फ़ुर्सत ही नहीं है''।
उस ने मुझ को अजीब सा जबाब दिया''जान फ़ुर्सत तो है पर मिलती नहीं है''...

मे सोच में पड़ गई सच ही तो है फ़ुर्सत किस के पास है ?न मेरे पास, न तुम्हारे पास ,न उस के पास, न इस के पास, आखिर फ़ुर्सत गई ती गई कहाँ?॥
चन्द वक़्त पहले तो थी,और थी भी ऐसे की पूरी की पूरी ढेर सारी फ़ुर्सत हमारे ही पास रहती थी.पर अब ऐसा क्या हो गया ?आखिर फ़ुर्सत गई तो गई कहाँ?...क्या उस से पहले क़यामत आई थी ,या उस के बाद आ गई?? कुछ समझ नहीं आता...

किस के पास चली गई वो?कोई लौटाएगा क्या? में खोज खोज कर परेशां हो गई... शाम हो गई दिल भी दुखने लगा इसीलिए की दिल लग गया था उस से.... रोने को जी चहा ..पर ये तो भूल ही गई की रोने के लिए भी तो फ़ुर्सत ही जरुरी ...क्या करूँ देखते ही देखते सरे कम रुकते चले गए ....
क्यों की फ़ुर्सत नहीं मिली सोचने लगी,'' क्या हम अपाहिज हो चुके हैं?'' नहीं तो फ़ुर्सत के बगैर हमारा जीना मुश्किल क्यों हो रहा है? .....उस के सहारे के बगैर क्यों हम कुछ नहीं कर पा रहें?मन बड़ा ख़राब सा हुवा ..छत पर चली आई देखा सड़क पर भागते और दौड़ते लोग,सायद इनको भी फ़ुर्सत की ही तलाश होगी । लोगों की जरूरतें इतनी बढ़ चुकीं हैं की वो भूल चुकें हैं की वो कौन हैं?फ़ुर्सत की ही तलाश में इंसान सुबह से लेकर शाम तक भागता रहता है ..
वही करता है जो रोज करता है कोई सिसीफस की तरह । फिर भी वो खुश नहीं रहता क्यों की इतना करने के बाद भी उस को फ़ुर्सत नहीं मिलती ...
आखिर फ़ुर्सत कहाँ है???? सायद इन्ही भागते और दौड़ते लोगो के भीड़ में में भी शामिल हूँ... और हम में से कोई भी नहीं जनता के फ़ुर्सत भी हमारे ही साथ साथ भाग रही है करना कुछ नहीं है बस थोड़ी देर रुकना है और एक क़तरा सांस लेना है चैन का सुकून का फिर हम को हमारा जबाब मिल जायगा
की जिस फ़िरसत की हम को इतनी बेकरारी से तलाश है ''वो फ़ुर्सत आखिर है तो कहाँ है''????.......

''क्या कर पाएंगे हम इस २१वी सदी में??

....

Monday, April 19, 2010

नेपाली ग़ज़ल...

तिम्रो बोली तिम्रो मधुर आवाज़ हो मेरो ग़ज़ल।
तिम्रो धर्ती तिम्रो खुला आकाश हो मेरो ग़ज़ल॥

हरेक साँझ तिम्रो यादमा हराउदा हावा संगै।
बही आउने माँयालू सुवास हो मेरो ग़ज़ल॥

धर्ती बेग्लै आकाश ऐउटै तिम्रो मेरो दूरी भन्नु।
सम्झनामै जिउने मर्ने प्रवास हो मेरो ग़ज़ल॥

बद्लिएको छैन केही हिजो जस्तै आज पनि।
मौनतामै सिमित प्रेमको आभाष हो मेरो ग़ज़ल॥

समयको चाल संगै जति छिटो दौड़े पनि।
मृगतृष्णा जिंदगीको प्रयास हो मेरो ग़ज़ल...



Tuesday, April 13, 2010

नेपाली ग़ज़ल.....

तिमी हिंड्ने बाटोको बाधा मेरो माँया भयो।
पुरै गर्न चाहें सधै आधा मेरो माँया भयो॥

मिलनको सपनालाई अझ रंगीन बनाउन।
आफ्नै रगत बागाएनी सादा मेरो माँया भयो॥

दुई पाईला साथ हिंड्ने रहर बोकी बंधनहरु।
सबै सबै फुकाएनी बाँधा मेरो माँया भयो॥

भएनौ दोषी तिमी सधैं भूल मेरो मात्रै।
सायद होला तिमीलाई ज्यादा मेरो माँया भयो॥

स्वोदेश तथा विदेशमा रहनु भएका संपूर्ण नेपालीलाई
नया बर्ष को शुभकामना
दीक्षा रिसाल ''बुकि''
..........




Thursday, April 8, 2010

हमसफ़र नहीं....

हमसफ़र नहीं दोस्तों एक तनहा सफ़र मांगो।
काफ़िर चेहरों पर न ठहरे तुम ऐसी नज़र मांगो॥

उसकी गली में बेसबब तुम भटका न करो।
मंजिल दिखे जहाँ से ऐसी राह गुज़र मांगो॥

ये शहर ऐसा नहीं किसी के भी पास जाओ।
बेक़ारार हो तो सुनो दूर से ही ख़बर मांगो॥

दौर-ऐ हाज़िर में भी हुस्न परदे तक महदूद क्यों है।
तुम को कहीं ऐसा लगे तो बेपर्दा शहर मांगो॥

जानना है जिंदगी तो रात का वो पिछला नहीं ।
चिल चिलाती धुप में गुमसुम दोपहर मांगो॥

ग़म तमाम और भी है जिंदगी में इसके सिवा।
मरना है इश्क में तो अपने लिए ज़हर मांगो.......



Monday, April 5, 2010

तीतली की तरह...

तीतली की तरह इतराके दिखा।
एक नज़र देखूं शरमाके दिखा॥

ख़ुशबू से तेरी गुलशन महके ।
बदन को जरा महकाके दिखा॥

कोई बुग्ज़ न कोई तल्ख़ी रहे।
रौनक़े दिल तू बढ़ाके दिखा॥

तू भी है हसीं मै भी हु जवां।
इमां को मेरे बहकाके दिखा॥

हो क़यामत आज महेफिल में ।
रूख़ से तू पर्दा हटाके दिखा ....